हर दिन एक श्लोक, एक अर्थ, और एक चिंतन। यदि कोई श्लोक आपसे जुड़ता है, तो उसी श्लोक को पूरे ऐप में अपनी स्थिति से जोड़कर समझ सकते हैं।
यदि आप अभी तनाव, डर, उलझन, संबंध या करियर की स्थिति में हैं, तो सीधे अपना प्रश्न लिखें।
उत्तर गीता के श्लोकों से जुड़े रहते हैं — स्पष्ट संदर्भ के साथ।
तेज़ शोर नहीं — धीमी, सम्मानजनक गति।
हर दिन एक श्लोक, एक अर्थ, और एक छोटा चिंतन। यदि यह आपसे जुड़ता है, तो उसी श्लोक को अपने जीवन पर लागू करके तुरंत पूछें।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||२-३०||
यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है, इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
आज इस श्लोक को अपने एक निर्णय, एक प्रतिक्रिया, और एक कर्म में उतारने का अभ्यास करें।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ||१६-२०||
वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च | अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ||१५-९||
(यह जीव) श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शेन्द्रिय, रसना और घ्राण (नाक) इन इन्द्रियों तथा मन को आश्रय करके अर्थात् इनके द्वारा विषयों का सेवन करता है।।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||२-१४||
शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है; वे अनित्य हैं, इसलिए, हे भारत !
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ||१६-१३||
मैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||३-४||
कर्मों के न करने से मनुष्य नैर्ष्कम्य को प्राप्त नहीं होता और न कर्मों के संन्यास से ही वह सिद्धि (पूर्णत्व) प्राप्त करता है।।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् | तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ||१४-१४||
जब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।