🙏 भगवद गीता गाइड
जीवन की उलझनों के लिए श्लोक-आधारित, सरल और शांत मार्गदर्शन
Bhagavad Gita guidance

आज का भगवद गीता श्लोक

हर दिन एक श्लोक, एक अर्थ, और एक चिंतन। यदि कोई श्लोक आपसे जुड़ता है, तो उसी श्लोक को पूरे ऐप में अपनी स्थिति से जोड़कर समझ सकते हैं।

गीता श्लोक आधारित
आधुनिक जीवन से जुड़ा हुआ
सरल, शांत, उपयोगी

यहीं से शुरू करें

यदि आप अभी तनाव, डर, उलझन, संबंध या करियर की स्थिति में हैं, तो सीधे अपना प्रश्न लिखें।

ऐप खोलें

श्रोत
श्लोक-प्रथम मार्गदर्शन

उत्तर गीता के श्लोकों से जुड़े रहते हैं — स्पष्ट संदर्भ के साथ।

अनुभव
शांत, स्पष्ट, लागू

तेज़ शोर नहीं — धीमी, सम्मानजनक गति।

आज का श्लोक और चिंतन

हर दिन एक श्लोक, एक अर्थ, और एक छोटा चिंतन। यदि यह आपसे जुड़ता है, तो उसी श्लोक को अपने जीवन पर लागू करके तुरंत पूछें।

13.34

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः | क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ||१३-३४||

जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

आज इस श्लोक को अपने एक निर्णय, एक प्रतिक्रिया, और एक कर्म में उतारने का अभ्यास करें।

9.17 · 2026-07-27

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः | वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ||९-१७||

मैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।

1.13 · 2026-07-26

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ||१-१३||

तत्पश्चात् शंख, नगारे, ढोल व शृंगी आदि वाद्य एक साथ ही बज उठे, जिनका बड़ा भयंकर शब्द हुआ।

14.21 · 2026-07-25

अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ||१४-२१||

इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है ?

2.65 · 2026-07-24

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ||२-६५||

प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।।

14.24 · 2026-07-23

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ||१४-२४||

जो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है; ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।

14.26 · 2026-07-22

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते | स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ||१४-२६||

जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या आज का गीता श्लोक हर दिन बदलता है?
हाँ, यह पेज दिन के आधार पर एक स्थिर श्लोक चुनता है ताकि सभी उपयोगकर्ताओं को उसी दिन वही दैनिक श्लोक दिखे।
क्या मैं इसी श्लोक को अपनी समस्या पर लागू करके पूछ सकता हूँ?
हाँ। हर दैनिक श्लोक कार्ड से आप पूरे ऐप में जा सकते हैं और उसी श्लोक को अपनी स्थिति से जोड़कर समझ सकते हैं।